Wednesday, September 29, 2010

तलाश


कब से तलाश है मुझे,
कुछ रिश्तों की
ऐसे..
जो हों 
निपट स्वार्थहीन,
शर्तहीन,
मजबूत और स्वाभाविक..
कि जिनमें जुड़ाव से पहले
कोई उद्देश्य न हो,
दोनों तरफ़
न हो कोई तात्कालिक
या विलंबित स्वार्थ ही,
कि जिनसे सब-कुछ नहीं,
तो बहुत-कुछ किया जा सके
साझा..
कि जिनसे मिलने पर
मिले
हर बार
ऊर्जा, पहले से ज्यादा
परस्पर..
और लगे
हाँ, यही..
यही तो हैं, जिन्हें कह सकते हैं ’संबंध’
अथवा ‘अपनापा’
क्योंकि जिन्हें अब तक
‘अपना’ मानते और जानते आए
वे तो भर चुके हैं गले तक
स्वार्थ, शर्त और उद्देश्यों से
खो रहे हैं अपनी खनक
लगातार..

5 comments:

वन्दना said...

आज सबकी यही तलाश है………………मगर ऐसे रिश्ते मिलना ही मुश्किल हैं।

Anonymous said...

Hi Kaushal ji, your poem is inspired by the soul of human identity. I know it is a difficult thing to find out relation beyound aspectation but it is great hope to crteat a new world of togetherness. Regards

Dalip Vairagi दलीप वैरागी said...

कौशल जी आपकी तलाश बिलकुल गैर वाजिब नहीं है और नहीं मुश्किल ... दरअसल आप एक अच्छा रिश्ता नहीं बल्कि एक अच्छे इसान की तलाश में हैं ...एक अच्छा इंसान बाहर तलाशेंगे तो नहीं मिलेगा शायद ... अपने अंदर बैठे अच्छे इंसान को बाहर लाकर सारी दुनिया के सामने ला खड़ा करें, फिर देखो सारा जहाँ अपना सा लगेगा |

लीना मल्होत्रा said...

sundar shabdo me rishto ko paribhashit kiya hai

Deepmala said...

kaushal ji....very nice poem.i just want to say onething, we can not get anything which we can not give to other and this is reality of life. Everyone aspect something from eachother and i do not think that it is wrong.......but we should not hurt anyone.........again congrates and gud wishes.