Sunday, November 20, 2016

रचना का सामाजिक पाठ ...


हिन्दी की युवा रचनाशीलता और आलोचना में पंकज पराशर एक स्थापित नाम है. हिन्दी और मैथिली में कविता-लेखन से लेकर कहानी, अनुवाद, समीक्षा और आलोचना तक उनकी अनेक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. प्रस्तुत आलेख में उनकी साहित्य भंडार प्रकाशन, इलाहाबाद से 2015 में प्रकाशित पुस्तक रचना का सामाजिक पाठ में संकलित लेखों की पड़ताल की गई है. यह पुस्तक पंकज द्वारा तद्भव’, बहुवचन’, पहल’, आलोचना’, साखी’, वर्तमान साहित्य’, अनहद’, लमही, पाखी’, नया ज्ञानोदय’, समयांतर और ‘शिक्षा विमर्श में प्रकाशित लेखों का संग्रह हैं. इसमें दो खण्ड हैं, जिनमें कुल मिलाकर सोलह लेख हैं.
   
पुस्तक का पहला लेख कला और सौंदर्य के गैर रूपवादी कथाकार शीर्षक से शेखर जोशी की कहानियों का मूल्यांकन है. जिसमें उन्होने नौरंगी बीमार है’, आशीर्वचन’, बदबू’, उस्ताद’, मेंटल जैसी कहानियों को अपनी आलोचना का आधार बनाया है. एक सजग आलोचक की तरह पंकज केवल शेखर की कहानियों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे उनकी तुलना नागार्जुन और रेणु जैसे रचनाकारों के साथ करते हुए इन सबकी संवेदना का एका प्रकट कर देते हैं. उन्होंने ठीक लिखा है कि, किसी भी भाषा के बड़े और महान रचनाकारों को पढ़ते समय स्वाभाविक रूप से अनेक महान रचनाओं की याद आती है. कहानी को पढ़ते समय सिर्फ कहानी याद आए, यह कोई जरुरी नहीं; उस मानवीय संवेदना को संपोषित करने वाली संरचना की संवेदना से जुड़ने वाली कोई महान कविता याद आ जाए तो इसमें कोई हैरत की बात नहीं है. यथा, ‘कोसी का घटवार में गोसाईं के जीवन के निचाट अकेलेपन को भरने के लिए उन्होंने जिस तरह कुत्ते, बिल्ली को साथ रखकर देखा है और गोसाई के अस्थिर तथा चंचल मन का चित्रण किया है, उससे गुजरते हुए यकायक बाबा नागार्जुन की अमर कविता ‘अकाल और उसके बाद की याद आती है. पंकज की टिप्पणी है कि,‘शेखर अपनी कहानियों में अभिजात्य और रूपवादी सौंदर्यबोध पर चोट करते हैं. वे बेहद मितव्यता से अपनी बात कहते हैं, चाहे वह गरीब हो, चाहे श्रमिक. हाशिए के समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी का एहसास उनकी कहानियों में साफ तौर पर मिलता है. उन्होंने साफ़ रेखांकित किया है कि, शेखर जोशी जैसा रचनाकार जो खुद मितभाषी है, उसके अपने मूल्यांकन के क्रम में स्वयं हिंदी आलोचना भी मितभाषी हो गई, जो ठीक नहीं हुआ.जाहिर है, इस आलेख से शेखर जोशी के रचनाकर्म के पुनर्मूल्यांकन की जरूरत महसूस होती है.

पितृसत्ता, स्त्री और समकालीन जीवन-यथार्थ शीर्षक से पुस्तक के दूसरे लेखमें अल्पना मिश्र की कहानी स्याही में सुर्खाब के पंख को आधार बनाया गया है. यह पितृसत्ता की क्रूरता, कुलीनता की हिंसा और नृशंसता की कहानी है. पंकज ने इस कहानी की बहुत अच्छी समीक्षा की है, हालांकि मुझे निजी तौर पर इस लेख के शुरुआती साढ़े-तीन पृष्ठ रचना की समीक्षा के संदर्भ में बहुत जरूरी नहीं लगे. इनमें स्वानुभूति बनाम सहानुभूति की बहस पर बात की गई है. पंकज की इस पुस्तक से गुजरते हुए उनकी समीक्षा-दृष्टि के सुथरे पैमानों पर तो बहुत ढंग से ध्यान जाता ही है, लेकिन एक बात खटकती भी है, वह ये कि वह एक बात को सिद्ध करने के लिए तर्कों का अंबार लगा देते हैं, यहाँ तक कि संदर्भ के रूप में एक के बाद एक अनेक बड़े नामों और उनके कथनों को पेश करते चले जाते हैं, इससे मुद्दा थोड़ा बोझिल-सा लगने लगता है, जबकि उनकी बात दो या तीन उदाहरणो में ही स्पष्ट हो चुकती है. ख़ैर,

कहानी के स्त्री बनाम स्त्री की कहानी नामक लेख भी उनके पिछले लेख की तरह स्वानुभूति और सहानुभूति की बहस में स्त्री प्रश्न पर स्वानुभूति को प्राथमिकता देता दिखाई देता है. इसमें उन्होंने लवलीन की कहानी चक्रवात’, जयश्री रॉय की ‘एक रात, कविता की बावड़ी, वंदना राग की पति परमेश्वर, गीताश्री की ‘गोरिल्ला प्यार, इंदिरा दांगी की ‘मैंने परियाँ देखी हैं’, के माध्यम से अपनी बात को स्पष्ट किया है. उनकी यह टिप्पणी काबिले-गौर है कि,स्त्री जीवन के समकालीन यथार्थ को अधिक प्रामाणिक और वास्तविक रूप में स्त्री कथाकारों की नजर से ही देखना मुमकिन है.

भूमंडलीकृत भाषा में संवेदना की परिभाषामे प्रियदर्शन की कहानी ‘पेइंग गेस्टकी समीक्षा की गई है. इसमें उन्होंने लिखा है, भूमंडलीकरण ने हमारी भाषा को गहराई से प्रभावित किया है. हमारी संवेदना और सोच भूमंडलीकृत समय के मुताबिक अनुकूलित हो रही है, जिसे सामाजिक आदतों और सार्वजनिक व्यवहारों में आसानी से लक्षित किया जा सकता है. लेखक के अनुसार, भूमंडलीकृत सभ्यता में अंतरंगता अंततः संबंधों के दायरे का अतिक्रमण नहीं कर पाती. इस सभ्यता का सबसे बड़ा सच यह है कि मनुष्य की प्राथमिकताएं बदलती रहती हैं. इस बात को रांची से दिल्ली आकर मैसेज मैठानी के घर में बतौर पेइंग गेस्ट रह रही शालिनी के उदाहरण से समझा जा सकता है.

मिसेज मैठानी शालिनी को चाहे जितनी सुविधाएँ देती रही हों, बीमार पड़ने पर शालिनी की चाहे जितनी जितनी सेवा कर चुकी हों, उसके दोस्तों को आने-जाने और मस्ती करने की चाहे जितनी आजादी देती रही हों, लेकिन शालिनी के लिए वह सिर्फ मिसेज मैठानी ही रहती हैं. उम्र के एक बड़े फासले के बावजूद शालिनी मिसेज मैठानीको न चाची कह पाती है, न आंटी करने में सहजता महसूस करती है. वह एक कामकाजी संबोधन मिसेज मैठानी का बना पाती है. शालिनी का यह वाक्य आप मेरी मां बनने की कोशिश न करें एक प्रतीक वाक्य जैसा है कि एक दूसरे की आजादी का सम्मान अंतरंगता और संबंधों को लेकर उदारता पूर्ण व्यवहार के बावजूद इसे संबंधों की गहराई और बेहद इसे जोड़ना संभव नहीं है. लेकिन इस बात का दूसरा पहलू भी है. प्रियदर्शन ने अपनी  कहानी में जिस ओर इशारा किया है, वह सच का एक रूप तो हो सकता है पर पूरा सच नहीं है. इसके उलट भी समाज में ढेरों उदाहरण मौजूद हैं. भरपूर भूमंडलीकरण और उत्तर आधुनिकता के बावजूद मनुष्य की संवेदना अभी भी इतनी यांत्रिक और पशुवत नहीं हुई है, जिसकी ओर प्रियदर्शन इशारा कर रहे हैं.


संजीव बख्शी के उपन्यास ‘भूलन कांदा की समीक्षा बतौर आदिवासी जीवन का यथार्थ और हिंदी उपन्यास शीर्षक से लिखे गए लेख के शुरुआती हिस्से में रचना और शोध कार्य के क्षेत्र और उनके आपसी अंतर्संबंधों पर बात की गई है. इस क्रम में पंकज ने स्पष्ट लिखा है कि, मानवीयता संवेदनशीलता और संस्कृति समीक्षा के बगैर कोई उपन्यास एक रचना असंभव है, जबकि तथ्य और सूचना विश्लेषण पर आधारित अध्ययन का काम इसके बिना भी चल सकता है. शायद रचना की प्रामाणिकता और स्वाभाविकता को लेकर हिंदी आलोचना में जिस तरह की/से बातें हुई हैं उसके कारण भी शायद उपन्यासकारों का रुझान तथ्यों पर आधारित उपन्यास लिखने की ओर हुआ है. दूसरी बात यह कि वर्षों से सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यक रूप से भी हाशिए पर रहे दलित और आदिवासी अब समकालीन राजनीति और साहित्यिक विमर्श की मुख्यधारा में शामिल हैं, इनको केंद्र में रखकर लिखी गई पुस्तकों की बाजार में एक मांग है, जिसके कारण दलितों और आदिवासियों को केंद्र में रखकर उपन्यास लिखे जा रहे हैं इनमें वह लोग भी शोधाधारित उपन्यास लिख रहे हैं, जिन्हें आदिवासी जीवन का कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है न कोई जानकारी और न उनके जीवन और संस्कृति से कोई परिचय. 

पंकज यहाँ शोध आधारित उपन्यास के क्रम में सहानुभूति या स्वानुभूति के सवाल से भी टकराने का प्रयास कर रहे हैं
, हालांकि अब शोध आधारित रचना या मानवीय संवेदना पर आधारित रचना का प्रश्न ज्यादा मुखर होना चाहिए न कि सहानुभूति बनाम स्वानुभूति का प्रश्न. पंकज मूलतः अपने विश्लेषण में यही कहना चाहते हैं. आदिवासी संदर्भों पर बात करते हुए उन्होंने लिखा है कि, आदिवासियों का जीवन अधिक सहज छल-प्रपंच रहित और प्रकृति के साथ सहज सामंजस्यपूर्ण होता है. वे मुख्यधारा के कथित सभ्य समाज के शोषणचक्र में भी इसीलिए फँस जाते हैं कि इस समाज के तौर तरीके और काइयांपन से वे भोले लोग सर्वथा अनजान होते हैं लेकिन जब उन्हें अपने साथ हो रहे छल-प्रपंच का पता चलता है या उनके समाज के सामने कोई संकट आता है, तो उसका सामना सिर्फ एक पीड़ित व्यक्ति, नहीं बल्कि पूरा समाज मिल करके करता है. किसी व्यक्ति को अकेला छोड़ देना गैर-आदिवासी समाज की प्रवृत्ति है. इसी क्रम में आगे लिखा गया है, सबसे अधिक समस्या आदिवासियों के जीवन में बाहरी हस्तक्षेप से बढ़ी है, जिसके कारण संघर्ष बढ़ा है.’ 

मेरे विचार से पंकज जी की उक्त सारी बातें उस जगह अच्छी तरह से लागू हो सकती हैं
, जहां आदिवासी और गैर-आदिवासी समुदाय साथ-साथ/आस-पास रहते हैं या जहां उदारीकरण, निजीकरण, विकास और दबंगई के कारण भी आदिवासियों से गैर-आदिवासियों द्वारा उनके संसाधन छीने जा रहे हों. यानी जहां आदिवासी समुदाय कम संख्या में है और वे लोग अभी भी पढ़े लिखे नहीं है, यह तर्क वहां सही हो सकता है, जहां हम आदिवासियों को अभी भी आदिम रूप में ही देख, समझ, पा और स्वीकार रहे हैं. ‘भूलन कांदा के परिप्रेक्ष्य में यह बात ठीक हो सकती है, पर आदिवासी मात्र पर इसे लागू नहीं किया जा सकता.

जरा एक नजर पूर्वोत्तर की ओर डालिए
, वे राज्य, जो आदिवासी बहुल हैं, वे राज्य, जहां साथ-साथ/आस-पास गैर-आदिवासी नहीं बल्कि विभिन्न आदिवासी जनजातियां ही रहती हैं. जहां शिक्षा भी पहुंच रही है और सत्ता व राजनीति पर भी इन्हीं आदिवासियों का प्राधान्य; क्या पंकज जी की बात वहां लागू हो पाएगी! सच यह है कि पूर्वोत्तर में एक आदिवासी समुदाय ही दूसरे आदिवासी समुदाय से सत्ता और साधनों के लिए संघर्षरत है. यहाँ अगड़े आदिवासियों के मन में दूसरे पिछड़े आदिवासियों के प्रति वैसा ही भाव देखा जा सकता है, जैसा कि छत्तीसगढ़ में आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच है.

आफस्पा
कानून तथा पड़ोसी राज्यों और देशों से घुसपैठ आदि को छोड़ दें तो यहां आदिवासियों की आपसी समस्याएं कम नहीं है. यहां शिक्षित हो गए और नौकरियों में आ गए आदिवासी पिछड़े अनपढ़ आदिवासियों को बेतरह कमतर समझते हैं. तो क्या अगड़े होने के कारण, बेवकूफ़ माने जाने की हद तक सीधे-सादे न रह जाने के कारण ये समुदाय आदिवासी नहीं कहलाए जाएंगे! नकार दीजिए न! अब चाहें तो लगे हाथ कह डालिए कि नफरत का यह संस्कार उन्हें पूंजीवादी स्थितियों और निजीकरण आदि से पनपी नई परिस्थितियों ने दिया है, पर एक मिनट रुकिए, पहले जरा सोचिए कि जो दुनिया इतनी सीधी-सादी, भोली और सहज थी, वह ऐसी क्योंकर हो गई कि अपने ही दूसरे आदिवासी समुदाय का गला घोंटने पर उतारू हो गई? तथाकथित सभ्यता का आवरण ओढ़े जाने से पूर्व जब कभी हम स्वयं जंगलों में रहते होंगे तो क्या हम भी ऐसे ही सीधे और भोले नहीं थे? फ़िर भोलेपन का तर्क सिर्फ़ आदिवासियों के साथ ही क्यों? हम इस बात पर स्यापा क्यों नहीं करते कि हमारे और सरकार द्वारा न केवल निजी और सरकारी स्वार्थों की पूर्ति के लिए आदिवासियों का शोषण बंद किया जाना चाहिए बल्कि उन्हें नई परिस्थितियों के अनुसार उनके जीवन को समृद्ध करने की अच्छाई बुराई बताकर उन्हें जेनुइन ढंग से आगे बढ़ने में मदद करनी चाहिए न कि उन्हें दया का पात्र बना देना चाहिए!

भूलन कांदा का जिक्र करते हुए पंकज कहते हैं कि, ‘छत्तीसगढ़ के आदिवासी बेहद भोले और छल-प्रपंचों से दूर शांतिप्रिय जीवन में यकीन रखने वाले हैं, जिन्हें यह तक नहीं मालूम कि भारत कब गुलाम था, कब आजाद हुआ, पहले कौन शासक था और आज कौन शासक है.’ 

सवाल यह है कि आखिर इसमें गलती किसकी है कि आदिवासी मूर्खता की हद तक भोले व पिछड़े रह गए. इसमें हम तथाकथित अगड़ों की जिम्मेवारी कितनी है
, इसकी भी पड़ताल की जानी चाहिए. बहरहाल, ‘भूलन कांदा उपन्यास की तारीफ में पंकज के तर्क से बखूबी सहमत हुआ जा सकता है कि,यह एक ऐसा उपन्यास है, जो आदिवासी जीवन के बारे में कोई मायालोक नहीं रचता. उन्होंने उपन्यास का नैरेशन बहुत अच्छा किया है; आदिवासी प्रकृति पूजक हैं, सामूहिकता में बेहद यकीन रखते हैं, सुख-दुख में साथ रहते हैं, पर फ़िर कहें कि यह बात क्षेत्र विशेष के आदिवासी समुदाय विशेष पर लागू हो सकती है, सब पर नहीं. उपन्यास में देखें तो, जो सामूहिकता मुखिया के कहने पर सारे आदिवासी समुदाय की एक आवाज बन जाती है कि बच्चों की हत्या गंजहा द्वारा नहीं, भकला के हाथों हुई है, वह दूसरी बार जांच के समय क्यों सामने नहीं आ पाती! गंजहा को जेल में इतना मेहनती व शांत देखकर जेलर को शक हो जाता है कि यह आदमी हत्यारा नहीं लगता. सो वह जांच बिठवाता है और वही आदिवासी समाज जो पहली बार में सामूहिकता के लिए जान देने को तत्पर था, दूसरी बार में टूट जाता है. जाहिर है, इसके कारणों की पड़ताल भी की जानी चाहिए. 

पंकज की आलोचना में
नेम ड्रॉपिंग काफ़ी देखी जा सकती है. यहाँ भी उन्होंने लिखा है कि, ‘नोबल पुरस्कार से सम्मानित अमरीकी उपन्यासकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे के कालजयी उपन्यास द ओल्ड मैन एंड द सी की तरह संजीव बख्शी का यह उपन्यास भूलन कांदा भारी-भरकम उपन्यास नहीं है.यहाँ हेमिंग्वे की  तुलना किस अर्थ में की गई, स्पष्ट नहीं हो पाया. 

करुणा की चित्रलिपि में जीवन का गद्य नामक लेख महादेवी वर्मा के गद्य साहित्य पर केंद्रित है. इसमें पंकज ने ठीक रेखांकित किया है कि, आचार्य शुक्ल ने अपने इतिहास के संशोधित संस्करण में महादेवी वर्मा के गद्य का जिक्र नहीं किया, जबकि 1940 में आए अपने इतिहास के संशोधित संस्करण में शुक्लजी ने लिखा है, ‘इस संस्करण में समसामायिक साहित्य का अब तक का आलोचनात्मक विवरण दे दिया गया है जिससे आज तक के साहित्य की गतिविधि का पूरा परिचय प्राप्त होगा, लेकिन उन्होंने महादेवी के गद्य का ज़िक्र नहीं किया. यही कारण है कि महादेवी की पहचान बड़े स्तर पर एक कवयित्री की ही बनकर रह गई जबकि उनका गद्य भी कम मार्के का नहीं है.’ 

पंकज ने अपने लेख में महादेवी के इस अचीन्हे गद्य पर बारीकी से विचार किया है. उनके अनुसार
, ‘प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों में गुलाम भारत के ग्रामीण और किसानों के जीवन यथार्थ का चित्रण जिस रूप में हुआ है, उसे अनुपमेय माना जाता है पर यदि हम महादेवी के अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखाएं और पथ के साथी के संस्मरणों में चित्रित ग्रामीण स्त्रियों की पराधीनता की पीड़ा और तत्कालीन जीवन यथार्थ को देखें तो लगता है प्रेमचंद ने ग्रामीण स्त्रियों के जीवन यथार्थ का जैसा चित्रण किया है, वह एक पुरुष की दृष्टि से देखे हुए यथार्थ की महज ऊपरी परत है उनके कथा साहित्य में स्त्रियों का जीवन यथार्थ पुरुषों के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन यथार्थ का ही एक हिस्सा-सा है, जिसमें स्त्रियों के वैयक्तिक जीवन-यथार्थ, व्यक्तिगत दुख, आकांक्षा और उसकी छटपटाहटों को कम जगह मिली है.’ 

श्रृंखला की कड़ियां में महादेवी लिखती हैं, ‘नारी का मानसिक विकास पुरुषों के मानसिक विकास से भिन्न परंतु अधिक द्रुत, स्वभाव अधिक कोमल और प्रेम-घृणादि भाव अधिक तीव्र तथा स्थाई होते हैं, इन्हीं विशेषताओं के अनुसार उसका व्यक्तित्व विकास पर समाज के उन भावों की पूर्ति करता रहता है जिनकी पूर्ति पुरुष द्वारा संभव नहीं.आलोचक पंकज पराशर ने इस संदर्भ की तुलना करते हुए विश्लेषित किया है कि ‘प्रेमचंद चूंकि कथाकार थे, इसलिए कथा-साहित्य के पात्रों के बारे में कल्पना से छूट लेकर और उनके स्वरूप और स्वभाव को गढ़ने की गुंजाइश थी, लेकिन महादेवी वर्मा ने संस्मरण, रेखाचित्र और निबंध की राह चुनी, जिसमें कल्पना और गल्प की कोई गुंजाइश नहीं होती. एक और बात जिसका जिक्र करना यहां अप्रासंगिक नहीं होगा कि प्रेमचंद की सहानुभूति स्त्रियों के साथ है, परंतु स्वानुभूति प्रेमचंद के पास नहीं है, इसलिए वह एक स्त्री की तरह गुलाम भारत की स्त्रियों की सामाजिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक पराधीनता के यथार्थ को समझने में असमर्थ थे.’ 

महादेवी के संस्मरण
, रेखाचित्र एवं निबंध वाकई स्त्री-दृष्टि से बेहद गंभीर और स्वानुभूत दृष्टि लिए हैं. श्रंखला की कड़ियां, अतीत के चलचित्र और स्मृति की रेखाएं जैसी रचनाओं के ढेरों उदाहरण इस बात को सिद्ध करते हैं. यहाँ पंकज की टिप्पणी है कि महादेवी वर्मा ने जिन पात्रों और उनके समाजों के बारे में लिखा है, उसमें सिर्फ स्त्रियां ही व्यवस्था और सत्ता की सताई हुई नहीं है, पुरुष भी पीड़ित हैं, इसलिए महादेवी को सिर्फ स्त्रियों के पक्ष में लिखने वाली स्त्रीवादी लेखिका कहना ठीक नहीं होगा. पुरुष सत्ता, समाज सत्ता और अर्थसत्ता के शिकार भारतीय समाज में सिर्फ स्त्रियां ही नहीं, पुरुष भी हैं. अपनी भावुकता और निश्छलता से पुरुषों की विवशता भी लेखिका के हृदय को अपार करुणा से आप्लावित कर देती है. बदलू’, ‘घीसा’, ‘रामा’, ‘अलोपी’, ‘चीनी फेरीवाला’, ‘जंगबहादुर और ठकुरी बाबा ऐसे पात्र हैं, जिनकी दशा उसी तरह लेखिका को मर्माहत करती है, जैसी कि ‘गुंगिया, भक्तिन, बिबिया, सबिया, अभागी स्त्री, बालिका माँ या बिट्टो की. महादेवी के संस्मरण, रेखाचित्र एवं निबंध वाकई स्त्री-दृष्टि से बेहद गंभीर और स्वानुभूत दृष्टि लिए हैं. श्रंखला की कड़ियां, अतीत के चलचित्र और स्मृति की रेखाएं जैसी रचनाओं के ढेरों उदाहरण इस बात को सिद्ध करते हैं. यहाँ पंकज की टिप्पणी है कि महादेवी वर्मा ने जिन पात्रों और उनके समाजों के बारे में लिखा है, उसमें सिर्फ स्त्रियां ही व्यवस्था और सत्ता की सताई हुई नहीं है, पुरुष भी पीड़ित हैं, इसलिए महादेवी को सिर्फ स्त्रियों के पक्ष में लिखने वाली स्त्रीवादी लेखिका कहना ठीक नहीं होगा. पुरुष सत्ता, समाज सत्ता और अर्थसत्ता के शिकार भारतीय समाज में सिर्फ स्त्रियां ही नहीं, पुरुष भी हैं. अपनी भावुकता और निश्छलता से पुरुषों की विवशता भी लेखिका के हृदय को अपार करुणा से आप्लावित कर देती है. बदलू’, ‘घीसा’, ‘रामा’, ‘अलोपी’, ‘चीनी फेरीवाला’, ‘जंगबहादुर और ठकुरी बाबा ऐसे पात्र हैं, जिनकी दशा उसी तरह लेखिका को मर्माहत करती है, जैसी कि ‘गुंगिया, भक्तिन, बिबिया, सबिया, अभागी स्त्री, बालिका माँ या बिट्टो की. रोचक है कि पंकज अपने तर्क से स्वानुभूति और सहानुभूति के स्तर पर जो बात प्रेमचंद पर लागू कर रहेहैं, वह महादेवी पर लागू क्यों नहीं हो रही! इसी लेख में दी गई पिछली टिप्पणी के अनुसार यदि प्रेमचंद के लेखन में पुरुष की दृष्टि से लिखा होने के कारण उसमें स्त्रियों के वयक्तिक जीवन यथार्थ व्यक्तिगत दुख आकांक्षा और उसके छटपटाहटों को कम जगह मिली है, स्वानुभूति न होने के कारण प्रेमचंद एक स्त्री के तरह गुलाम भारत के स्त्रियों के सामाजिक ऐतिहासिक और राजनैतिक पराधीनता को समझने में असमर्थ रहे होंगे, तो फ़िर महादेवी उसी तर्क से एक स्त्री होने के कारण अपने लेखन में पुरुषों के प्रति वस्तुनिष्ठ कैसे हो जाएँगी! 

पंकज जी स्वानुभूति बनाम सहानुभूति के तर्क से प्रेमचंद को तो कमतर साबित कर दे रहे हैं
  पर ऐन उसी आधार पर महादेवी वर्मा को स्थापित कर रहे हैं. यद्यपि पंकज जी ने महादेवी के स्त्री-पात्रों की आर्थिक आजादी, शिक्षा, बाल-विवाह, बेमेल-विवाह, दहेज आदि से संबंधित मुद्दों का बड़ा अच्छा विश्लेषण किया है. उन्होंने न केवल मनुष्य बल्कि मनुष्येतर प्राणियों को भी अपने गद्य का प्रमुख हिस्सा बनाया, इसका भरपूर रेखांकन इस आलेख में किया गया है.

हिंदी गद्य की शमशेरियत एक छोटा लेख है, जिसमें शमशेर के गद्य की विशेषताओं की सैद्धांतिक चर्चा की गई है, लगभग इस अर्थ में कि अगर गद्य कवियों की कसौटी है तो शमशेर की कसौटी गद्य में भी कविता, रंग और चित्र ही है. मुझ में ढलकर बोल रहे जो वे समझेंगेभारत यायावर की नामवर होने का अर्थकिताब की समीक्षा बतौर लिखा गया है. इसमें प्रोफ़ेसर नामवर सिंह जैसे जीवंत किंवदंती बन चुके शिखर आलोचक के वाद-विवाद और संवादों पर एक अच्छा वैज्ञानिक-विश्लेषण मौजूद है.

निज लय का अनुपम गद्य में राजेश जोशी की पुस्तक किस्सा कोताकी समीक्षा की गई है. इसी तरह विष्णु नागर आलोचना से मुखामुखममें विष्णु नागर की पुस्तक कविता के साथ-साथ की समीक्षा है. इस अर्थ में ‘1857 का गदर और मिर्ज़ा ग़ालिएक महत्वपूर्ण लेख है. ग़ालिब जैसा महान शायर अपनी शायरी और दस्तंबूनामक अपनी डायरी में 1857 के गदर के बारे में क्या लिख रहा था, इसके बेहतरीन विवेचन के साथ उस दौर में मिर्जा ने अपने निजी जीवन में क्या-क्या झेला, इसकी दास्तान भी बयाँ की गई है.

इस पुस्तक का दूसरा खंड इतिहास बनाम विमर्श शीर्षक से है, जिसका पहला लेख है- खड़ी बोली कविता का इतिहास : तथ्य और सत्य’. शुरुआत में पंकज ने इस बात पर गहराई से विचार किया है कि किसी भी इतिहास को पढ़ने के साथ-साथ उसमें मौजूद तथ्यों और निष्कर्षों को सीधे सीधे स्वीकार लेने के बजाय, इतिहासकार ने उन्हीं तथ्यों और निष्कर्षों को क्यों रखा होगा, यह जानना चाहिए और इसके लिए स्वयं उस इतिहासकार की मंशा का भी अध्ययन किया जाना चाहिए. हिंदी, हिंदू, हिंदी जाति की अवधारणा और नवजागरण के परिदृश्य की ऐतिहासिक स्थिति जानने के लिए इस लेख का शुरूआती हिस्सा बेहद महत्त्वपूर्ण है, साथ ही खड़ी बोली की कविता की शुरुआत एवं खड़ी बोली को अपनाने संबंधी भारतेंदु आदि लेखकों के संशय की पड़ताल भी इस लेख में की गई है.

पंकज ने लिखा है कि, जिस खड़ी बोली में कविता करने की बात को मुश्किल कहकर कविगण पहले से टालते रहे, उसकी एक पूरी परंपरा यहां पहले से मौजूद थी. खड़ी बोली कविता की परंपरा जिन भारतेंदु से शुरू हुई बताई जाती है, वह भारतेंदु इसमें कठिनतामहसूस करते हैं, जबकि आमिर खुसरो, कबीर, नजीर अकबराबादी, राम प्रसादनिरंजनीआदि इसमें सुगमतापूर्वक रचनाएं करते रहे.’ लेकिन इस लेख में चंदा झा का जिक्र जिस तरह भारतेंदु के बरक्स एक पैरेलल व्यक्तित्व की तरह खड़ा दिखाया गया है, वह बहुत तार्किक नहीं लगता. इसमें चंदा झा का बिहारी नवजागरण’, हिंदी जाति की अवधारणाआदि के संदर्भ में महत्व निदर्शन और विश्लेषण करने के बजाय खड़ी बोली कविता के संदर्भ में वे किस रूप में काम कर रहे थे, यह अधिक फोकस ढंग से कहा जाता, तो बेहतर होता.

वस्तुतः चंदा झा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर अलग से एक लेख होना चाहिए था, यहां सिर्फ खड़ी बोली की कविता के संदर्भ में उनके योगदान को रेखंकित किया जाता, तो शायद ज्यादा उचित होता.

इस पुस्तक में पब्लिक इंटलेक्चुअल और अमर्त्य सेन शीर्षक लेख की जितनी प्रसंशा की जाए, कम होगी. यह लेख केवल अमर्त्य सेन और उनकी किताब के जिक्र के साथ अंग्रेजी व अन्य भाषाओं में मौजूद अन्य कई पब्लिक इंटेलेक्चुअलों के लेखन और उनके विद्रोही व्यक्तित्व का रेखांकन ही नहीं करता, बल्कि इसमें पहली बार हिंदी में पब्लिक इंटेलेक्चुअलकी अंतरराष्ट्रीय अवधारणा को सामने रखा गया है.

कई विमर्शों के जनक लेवी स्त्रॉस नामक लेख लेवी स्ट्रॉस पर हिंदी में परिचयात्मक, लेकिन गंभीर किस्म का बन पड़ा है. इसे पढ़ने के बाद लेवी स्त्रॉस की समाजशास्त्र, दर्शन, नृतत्वशास्त्र एवं संरचनावाद संबंधित पुस्तकों के हिंदी अनुवाद एवं उनके पठन-पाठन की गहरी जरूरत महसूस होती है, ताकि हिंदी के पारंपरिक वैचारिक लेखन पर नवीन अंतरराष्ट्रीय प्रभाव एवं हस्तक्षेप संभव हो सके और हिंदी का लेखन वैश्विक स्तर पर खड़ा हो सके.

बालसाहित्य : खुद के बहाने एक बहस शीर्षक लेख में हिंदी में बाल साहित्य की वर्तमान अवस्था और उसकी जरूरत पर एक बेहतरीन विमर्श सामने आया है. पंकज जी ने इसे खुद अपने बचपन से जोड़कर बेहद व्यावहारिक आयाम दे दिया है. इसमें उठाए गए सवाल इतने मौजूँ हैं कि लगता है यह लेख जरूरी तौर पर हिंदी पाठ्यक्रमों का हिस्सा होना चाहिए ताकि हम वास्तविक धरातल पर न केवल अपने बुजुर्गों, अपने लोक और अपने बचपन की ओर लौट सकें, बल्कि आने वाली पीढ़ी को बाल साहित्य की अच्छी विरासत भी सौंप सकें.

हिंदी पट्टी के युवाओं का स्वप्न और संघर्ष इस पुस्तक का अंतिम लेख है. इसमें समकालीन परिदृश्य में हिंदी और अंग्रेजी लेखन की बाजार के नजरिए से पड़ताल हुई है, साथ ही यह सवाल भी बेबाकी से उठाया गया है कि क्या हिंदी में सक्रिय युवा लेखकों की रचनाओं में हिंदी पट्टी के युवाओं के स्वप्न और संघर्षों के प्रामाणिक अभिव्यक्ति हुई है! समकालीन युवा हिंदी कहानीकारों द्वारा लिखी जा रही कहानियां पर गंभीर सवाल उठाते हुए पंकज जी स्पष्ट कहते हैं कि आज की हिन्दी कहानी ने ग्रामीण संवेदना, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक आंदोलन आदि से जुड़े वास्तविक मुद्दों से हटकर सिर्फ शाइनिंग इंडियाके किस्से गढ़ने में तो महारत हासिल की है, पर युवाओं के वास्तविक स्वप्न व संघर्षों की प्रामाणिक अभिव्यक्ति यहां नहीं मिलती, जो कि वस्तुतः रचनाशीलता के साथ एक तरह का छल ही है.

पंकज पराशर की इस पुस्तक का हिन्दी जगत में स्वागत किया जाना चाहिए.
https://samalochan.blogspot.in/2016/11/blog-post_20.html में प्रकाशित..

Friday, September 30, 2016

पिंक : तू खुद की खोज में निकल

यों बात बहुत पीछे से शुरू की जा सकती है, पर चलिए एक ताज़ा उदाहरण से कहते हैं. 2007 में एक फ़िल्म आई थी 'जब वी मेट'. उस फिल्म में रेलवे का स्टेशन-मास्टर नायिका करीना कपूर से कहता है, ‘अकेली लड़की खुली तिजोरी की तरह होती है.हालांकि नायिका द्वारा तब उस फ़िल्म में एक पुरुष द्वारा कहे गए स्त्री-विरोधी, पूर्वाग्रही, सामंती वाक्य का वैसा विरोध नज़र नहीं आया था. हम जैसे बहुत-से पढ़े-लिखे दर्शकों को भी तब वह चमत्कारिकवाक्य सुनकर बहुत हँसी आई थी. बख़ैर, अब 2016 में एक फ़िल्म आई है- पिंक. 7-8 साल होने को आए, इस बीच सौम्या’, ‘निर्भया’, ‘डेल्टाबहुत कुछ हो गुजरा, अनेक कानून भी आए, पर हमारे समाज की मान्यताएँ अभी भी कमोबेश वही की वही हैं.अकेली लड़की को खुली तिजोरी मानने वाली’, ‘उसके इन्कार को इकरार समझने वालीस्त्री-विरोधी’, ‘पूर्वाग्रहीऔर सामंती. पिंकएक ऐसी फ़िल्म है, जो इन सारी कुमान्यताओं पर दनादन हथौड़े मारती है. 

यहाँ स्त्री द्वारानाकहने का मतलब अपने अभिधार्थ में नाही है, बिना रत्ती भर लक्षणा और व्यंजना की गुंजाइश के. उनका हँसना-बोलना, कपड़े, डांस-म्यूजिक पीना-पिलाना सब नॉर्मल व्यवहार के हिस्से हैं, मर्दों के लिए संकेतनहीं, प्लीज! अमिताभ बच्चन द्वारा वकील के रूप में जज के सामने दिया गया फ़िल्म का लगभग अंतिम डायलॉग कि, NO! No your honour! My client said no! नो एक शब्द नहीं है. एक वाक्य है. नो का मतलब नहीं होता है, फिर चाहें वो आपकी दोस्त हो, गर्ल फ्रेंड हो, कोई सेक्स वर्कर हो या आपकी बीवी ही क्यों न हो.’ हमारे आत्म-मंथन के लिए एक जरूरी वाक्य है. 

एक समय था, जब फ़िल्मों में सरकारी गवाह बन चुके व्यक्ति को गवाही के दिन अदालत तक पँहुचाने में निर्देशक अपनी सारी कला और ऊर्जा खपा देते थे, तब भी अपराधी अमीर जादे, किसी नेता या रसूख वाले के रिश्तेदार हुआ करते थे, तब भी हमारी मुस्तैदपुलिस अपराध होने के बाद ही आती थी और अक्सर अपराधी की ओर से उसे बचाने के लिए सारी कार्यवाही किया करती थी. तब नायक या नायिका गुस्से और अपमान में भर कानून अपने हाथ में लेकर अकेले दम पर अपराधियों से सुपरमैन/वुमन बनकर उनका खात्मा कर देता था और अंत में यह कहकर कि मैं इस देश के कानून का सम्मान करता/करती हूँ, उसके द्वारा अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया जाता था, फ़िल्म खत्म हो जाती थी, हम दर्शकगण नायक/नायिका के संघर्ष और उसकी जीतकी वाहवाही करते नहीं थकते थे. फ़िल्मों में स्त्री-मुद्दा तब भी, कम ही सही, एक विषय था, महिलाओं का उत्पीड़न, छेड़छाड़, बलात्कार तब भी थे, लेकिन उस समय की फ़िल्मों में उत्पीड़ित/शोषित महिलाओं की ओर से प्राय: उनके बेटे/भाई/मित्र/पिता अथवा पति यानी पुरुष अपराधियों से अपनी स्त्रियों पर हुए अत्याचार का बदला लेते थे. 

स्त्रियों की सीधी भागीदारी अपने प्रति हुए अपराध के विरोध में वैसी सीधी नहीं दिखती थी. लेकिन आज का परिदृश्य बदल गया है. फ़िल्मों के कथानक में कथा और कल्पनाका तत्त्व इधर लगातार कम होता दिख रहा है. अब स्त्री अपनी लड़ाई खुद लड़ रही है, कानून में पूरी आस्था के साथ भरपूर तर्क के बल पर. पिंकमें इसे देखा जा सकता है. पिंककी तीनों नायिकाएँ समाज द्वारा स्त्री को एक स्त्री के साथ सम्पूर्ण इंसान और स्वतंत्र सोच की आजाद इकाई स्वीकार करवाने तथा हिंसा की नहीं, वे बार-बार नाकहने के बावजूद अपने साथ जबरदस्ती किए जाने पर आत्मरक्षा के रूप में की गई हिंसक कार्यवाहीको आत्मरक्षाही मानने की लड़ाई लड़ रही हैं. ऐसे समाज में उनका डर जाना भी अस्वाभाविक नहीं हैं. जाहिर है, इस प्रक्रिया में उनके साथ एक पुरुष अमिताभ बच्चन भी वकील के रूप में आ खड़े हुए हैं. 

कुछ मित्रों को आपत्ति है कि डायरेक्टर साब को एक पुरुष ही वकील बनाना था, जो घटना से पहले स्वयं इन लड़कियों को घूराकरता था, कोई महिला वकील उन्हें नहीं सूझी. फ़िल्म ने उस घूरने वाले पुरुष को वकील बनाकर उसे स्त्रियों का संरक्षक और तारणहार बना दिया, जो अंतत: पुरुषवाद की जीत है. कहने को तो कोई यह भी कह ही सकता है, कि इसमें वर्किंग गर्ल्स के रूप में काम कर रही और एक-साथ रह रही तीनों लड़कियों में एक दिल्ली की पंजाबी है, दूसरी लखनऊ से मुस्लिम समुदाय की है और तीसरी नॉर्थ-ईस्ट की (संभवत: आदिवासी) है, इनमें एक भी लड़की 'दलित' क्यों नहीं है!! उसे भी एक वर्किंग-गर्ल के रूप में इनकी साथी दिखाया जाना चाहिए था, तब फ़िल्म और ज्यादा रियलिस्टिक होती. फ़िर कोई और मांग भी आ जाती. 

बहरहाल, यह बात तो सही है कि महिला वकील होनी चाहिए थी, तब फ़िल्म का तेवर कुछ और बेहतर बनता, लेकिन घूरनेवाली बात समझ में नहीं आई. यह सही है कि किसी को घूरना गलत है, स्त्री को घूरना तो अपराध है, अगर वह वास्तव में किसी को प्रताड़ित करने की दृष्टि से है तो! किसी ने कहा है कि, ‘गलत समझ के नहीं देखता हूँ तेरी तरफ/ ये देखता हूँ कि अंदाजे-ज़िन्दगी क्या है’, यह भी तो हो सकता है कि फ़िल्म में तीनों लड़कियों के अन्य पड़ोसियों की तरह वकील अमिताभ बच्चन उन्हें घूरन रहे हों, न ही अन्यों की तरह उनके घर में पुरुषों के आने-जाने के ‘टाइम’ और ‘ड्यूरेशन’ का रिकॉर्ड रख रहे हों, बल्कि पारम्परिक रूप में अकेली रह रही लड़कियों के प्रति एक सामान्य, सहज, मानवीय समझने वाला नजरिया रखकर देखरहे हों, कि जिन्हें पूरा समाज जो समझे बैठा है, वे वैसी हैं भी या नहीं! अन्यथा एक घूरने वाला आदमी उन लड़कियों के मुश्किल समय में अन्य सभी पड़ोसियों की तरह उनकी मदद नहीं भी कर सकता था, आम समाज की तरह उन्हें गश्ती पार्टीमानकर उनके विरोध में भी बना रह सकता था, क्योंकि तब अन्यों की तरह उसकी भी अकेली लड़की को खुली तिजोरी मानने वाली’, ‘उसके इन्कार को इकरार समझने वाली’ ‘स्त्री-विरोधी’, ‘पूर्वाग्रहीऔर सामंतीमानसिकता को अच्छी खुराक मिल रही होती, लेकिन उन्होंने इसके विपरीत जाकर उन पड़ोस में रहकर भी अन्जान जैसी लड़कियों की मदद की. 

मुझे लगता है, अमिताभ का एक पड़ोसी के रूप में उन्हें देखना, देखना ही था, ‘घूरनानहीं था. वैसे तो हमारे समाज की मानसिकता ही स्त्री-विरोधी है, एक-दूसरे के घरों में क्या हो रहा है, इसे लेकर हम अक्सर 'पीपिंग टॉम' बने रहते हैं. फिर अगर वे अकेली लड़कियाँ हों तो, उफ्फ्फ! फ़िल्म में दिल्ली में रह रही नार्थ-ईस्ट की लड़कियों के साथ प्रायः कैसा व्यवहार होता है, इसे भी संक्षेप में, पर बखूबी बताया गया है. सबका अभिनय बेजोड़ है, अमिताभ बच्चन सहित. मेरे विचार से हमें एक पॉपुलर, व्यवसायी एवं एंटरटेन्मेंट, एंटरटेन्मेंट और सिर्फ़ एंटरटेन्मेंट के लिए बदनाम हो चुके सिनेमा माध्यम से यथार्थ की अतिरिक्त माँग करने के बजाय हमारे बीच के मुद्दे उठाने और जनता में चेतना को विस्तार देने के कारण उसके लगातार रियलिस्टिक तथा मैच्योर होने और हमें मैच्योरिटी से सोचने तथा व्यवहार करने में थोड़ा-बहुत मददगार बनने पर प्रसन्नता जाहिर करनी चाहिए ..हाँ, कोसना उचित नहीं, आलोचना भरसक हो...तो आइए, ‘पिंकशब्द में निहित स्त्रियों के स्टीरियोटाइप विशेषणकी आलोचना के साथ उसकासंज्ञाके रूप में स्वागत करें और तनवीर गाज़ी के शब्दों में कहें कि, 'तू ख़ुद की खोज में निकल/तू किसलिए हताश है/तू चल तेरे वज़ूद की/समय को भी तलाश है'..